अध्याय 2 भारतीय संविधान में अधिकार

यह विस्तृत समरी अधिकारों के अर्थ, आवश्यकता, मौलिक अधिकारों, उनके अनुच्छेदों, संवैधानिक उपचार तथा मौलिक अधिकार और राज्य के नीति-निर्देशक सिद्धांतों के संबंध को परीक्षा-उपयोगी रूप में समझाती है।

Detailed SummaryClass 11Political Science

1. अधिकारों का अर्थ और आवश्यकता

अधिकार वे उचित दावे हैं जिन्हें व्यक्ति अपने विकास और सम्मानपूर्ण जीवन के लिए समाज तथा राज्य के सामने रख सकता है और जिन्हें कानून तथा संविधान संरक्षण देते हैं।

अधिकार व्यक्ति की स्वतंत्रता, समानता, गरिमा और विकास के लिए आवश्यक आधार प्रदान करते हैं।

लोकतंत्र में अधिकार आवश्यक हैं क्योंकि—

  • वे व्यक्ति की स्वतंत्रता और गरिमा की रक्षा करते हैं।
  • वे नागरिकों के बीच समानता स्थापित करते हैं।
  • वे सरकार की शक्ति पर संवैधानिक सीमाएँ लगाते हैं।
  • वे अल्पसंख्यकों और कमजोर वर्गों को संरक्षण देते हैं।
  • वे नागरिकों को सरकार के मनमाने कार्यों से सुरक्षा देते हैं।
  • वे लोकतांत्रिक भागीदारी और व्यक्ति के विकास के लिए आवश्यक परिस्थितियाँ बनाते हैं।

2. मौलिक अधिकारों की विशेषताएँ

भारतीय संविधान में मौलिक अधिकारों की व्यवस्था भाग III, अनुच्छेद 12–35 में है। वर्तमान संवैधानिक व्यवस्था में मुख्यतः छह मौलिक अधिकार माने जाते हैं।

मौलिक अधिकार अनुच्छेद
समानता का अधिकार 14–18
स्वतंत्रता का अधिकार 19–22
शोषण के विरुद्ध अधिकार 23–24
धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार 25–28
सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकार 29–30
संवैधानिक उपचार का अधिकार 32–35
अनुच्छेद 12 और 13अनुच्छेद 12 में 'राज्य' की परिभाषा दी गई है और अनुच्छेद 13 मौलिक अधिकारों के विरुद्ध बनाए गए कानूनों को असंगत होने की सीमा तक अमान्य करने का आधार देता है।

3. समानता का अधिकार — अनुच्छेद 14–18

अनुच्छेद 14 — कानून के समक्ष समानता

सभी व्यक्तियों को कानून के समक्ष समानता और कानूनों के समान संरक्षण का अधिकार है।

अनुच्छेद 15 — भेदभाव का निषेध

राज्य केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर नागरिकों के विरुद्ध भेदभाव नहीं कर सकता। संविधान कुछ पिछड़े और कमजोर वर्गों के हितों की रक्षा के लिए विशेष प्रावधानों की अनुमति देता है।

अनुच्छेद 16 — सार्वजनिक रोजगार में अवसर की समानता

राज्य के अधीन रोजगार या पदों के मामलों में नागरिकों को अवसर की समानता प्राप्त है।

अनुच्छेद 17 — अस्पृश्यता का अंत

अस्पृश्यता समाप्त की गई है और उसका किसी भी रूप में व्यवहार निषिद्ध है।

अनुच्छेद 18 — उपाधियों का अंत

राज्य सामान्यतः ऐसी उपाधियाँ प्रदान नहीं करेगा जो सैन्य या शैक्षणिक distinction के अतिरिक्त हों।

मुख्य बात: समानता का अधिकार कानून के समक्ष समानता, भेदभाव से सुरक्षा और समान अवसर सुनिश्चित करता है।

4. स्वतंत्रता का अधिकार — अनुच्छेद 19–22

अनुच्छेद 19 — छह प्रमुख स्वतंत्रताएँ

  1. वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
  2. शांतिपूर्वक और बिना हथियार सभा करने की स्वतंत्रता
  3. संघ या संगठन बनाने की स्वतंत्रता
  4. भारत में स्वतंत्र रूप से घूमने की स्वतंत्रता
  5. भारत के किसी भी भाग में निवास करने की स्वतंत्रता
  6. कोई व्यवसाय, व्यापार या पेशा अपनाने की स्वतंत्रता

इन स्वतंत्रताओं पर संविधान द्वारा निर्धारित परिस्थितियों में युक्तिसंगत प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।

अनुच्छेद 20 — अपराधों के संबंध में संरक्षण

  • बाद में बनाए गए कानून के आधार पर पहले किए गए कार्य को अपराध बनाकर दंडित करने से सुरक्षा।
  • एक ही अपराध के लिए दोबारा दंडित किए जाने से सुरक्षा।
  • किसी अभियुक्त को स्वयं अपने विरुद्ध गवाही देने के लिए बाध्य न करना।

अनुच्छेद 21 — जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता

किसी व्यक्ति को उसके जीवन या व्यक्तिगत स्वतंत्रता से कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही वंचित किया जा सकता है।

अनुच्छेद 21A — शिक्षा का अधिकार

6 से 14 वर्ष की आयु के बच्चों के लिए निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का प्रावधान है।

अनुच्छेद 22 — गिरफ्तारी और निरोध से संरक्षण

गिरफ्तारी की स्थिति में व्यक्ति को कुछ संवैधानिक सुरक्षा प्राप्त होती है। संविधान निवारक निरोध से संबंधित विशेष प्रावधान भी करता है।

5. शोषण के विरुद्ध अधिकार — अनुच्छेद 23–24

अनुच्छेद 23

  • मानव तस्करी पर रोक।
  • बेगार और अन्य प्रकार के जबरन श्रम पर रोक।

अनुच्छेद 24

14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को कारखानों, खानों या अन्य खतरनाक रोजगार में नियोजित करने पर रोक है।

6. धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार — अनुच्छेद 25–28

अनुच्छेद 25

अंतरात्मा की स्वतंत्रता तथा धर्म को मानने, आचरण करने और प्रचार करने की स्वतंत्रता।

अनुच्छेद 26

धार्मिक संप्रदायों को अपने धार्मिक मामलों का प्रबंधन करने की स्वतंत्रता।

अनुच्छेद 27

किसी विशेष धर्म के प्रचार या पालन के लिए विशेष रूप से कर देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।

अनुच्छेद 28

राज्य द्वारा पूरी तरह संचालित कुछ शिक्षण संस्थानों में धार्मिक शिक्षा से संबंधित संवैधानिक सीमाएँ।

7. सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकार — अनुच्छेद 29–30

अनुच्छेद 29

नागरिक समूहों को अपनी भाषा, लिपि और संस्कृति को सुरक्षित रखने का अधिकार है।

अनुच्छेद 30

धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों को अपनी पसंद के शैक्षिक संस्थान स्थापित और संचालित करने का अधिकार है।

8. संवैधानिक उपचार का अधिकार — अनुच्छेद 32

यदि किसी व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होता है, तो वह उनके संरक्षण के लिए सर्वोच्च न्यायालय जा सकता है।

मुख्य रिट हैं:

  • Habeas Corpus — बंदी प्रत्यक्षीकरण
  • Mandamus — परमादेश
  • Prohibition — प्रतिषेध
  • Certiorari — उत्प्रेषण
  • Quo Warranto — अधिकार-पृच्छा

उच्च न्यायालय भी अनुच्छेद 226 के अंतर्गत रिट जारी कर सकते हैं।

9. मौलिक अधिकार पूर्णतः निरंकुश नहीं हैं

मौलिक अधिकार अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, लेकिन वे असीमित नहीं हैं। विशेषकर अनुच्छेद 19 की स्वतंत्रताओं पर संविधान द्वारा निर्धारित परिस्थितियों में युक्तिसंगत प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।

अनुच्छेद 13 मौलिक अधिकारों के विरुद्ध कानूनों की संवैधानिकता की जाँच के लिए महत्वपूर्ण है।

10. राज्य के नीति-निर्देशक तत्व

राज्य के नीति-निर्देशक तत्व संविधान के भाग IV, अनुच्छेद 36–51 में हैं। इनका उद्देश्य ऐसी सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था बनाने में राज्य का मार्गदर्शन करना है जिसमें सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय तथा जनकल्याण को बढ़ावा मिले।

11. मौलिक कर्तव्य — अनुच्छेद 51A

मौलिक कर्तव्य अनुच्छेद 51A में दिए गए हैं। इनमें संविधान, राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्रगान का सम्मान करना, देश की एकता और अखंडता की रक्षा करना, पर्यावरण की रक्षा करना तथा वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करना आदि कर्तव्य शामिल हैं।

अधिकार और कर्तव्य लोकतांत्रिक जीवन में एक-दूसरे के पूरक हैं।

12. संपत्ति का अधिकार

संपत्ति का अधिकार अब मौलिक अधिकार नहीं है। 44वें संविधान संशोधन के बाद इसे मौलिक अधिकारों की सूची से हटा दिया गया। वर्तमान में अनुच्छेद 300A के अंतर्गत संपत्ति से वंचित किए जाने के संबंध में संवैधानिक संरक्षण प्राप्त है।

याद रखें: संपत्ति का अधिकार — अनुच्छेद 300A — संवैधानिक अधिकार, लेकिन मौलिक अधिकार नहीं।

13. मौलिक अधिकारों का विस्तार

समय के साथ न्यायपालिका की व्याख्या के कारण मौलिक अधिकारों का अर्थ व्यापक हुआ है। विशेष रूप से अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की अवधारणा का दायरा विस्तृत हुआ है।

इससे स्पष्ट होता है कि अधिकारों का अर्थ बदलती सामाजिक परिस्थितियों और न्यायिक व्याख्याओं के साथ विकसित हो सकता है।

14. सभी महत्वपूर्ण Articles एक नज़र में

अनुच्छेद मुख्य विषय
12 राज्य की परिभाषा
13 मौलिक अधिकारों के विरुद्ध कानूनों की वैधता
14 कानून के समक्ष समानता
15 भेदभाव का निषेध
16 सार्वजनिक रोजगार में अवसर की समानता
17 अस्पृश्यता का अंत
18 उपाधियों का अंत
19 छह स्वतंत्रताएँ
20 अपराधों के संबंध में संरक्षण
21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता
21A 6–14 वर्ष के बच्चों के लिए शिक्षा
22 गिरफ्तारी और निरोध से संरक्षण
23 मानव तस्करी और जबरन श्रम का निषेध
24 बच्चों के खतरनाक रोजगार का निषेध
25 अंतरात्मा तथा धर्म की स्वतंत्रता
26 धार्मिक मामलों का प्रबंधन
27 विशेष धर्म के प्रचार हेतु कर से स्वतंत्रता
28 धार्मिक शिक्षा से संबंधित प्रावधान
29 भाषा, लिपि और संस्कृति का संरक्षण
30 अल्पसंख्यकों के शैक्षिक संस्थान
32 संवैधानिक उपचार
33–35 मौलिक अधिकारों से संबंधित विशेष/पूरक प्रावधान
36–51 राज्य के नीति-निर्देशक तत्व
51A मौलिक कर्तव्य
300A संपत्ति का संवैधानिक अधिकार

15. मौलिक अधिकार और राज्य के नीति-निर्देशक सिद्धांत

भारतीय संविधान में मौलिक अधिकार और राज्य के नीति-निर्देशक सिद्धांत दोनों लोकतांत्रिक एवं कल्याणकारी राज्य की स्थापना के लिए महत्वपूर्ण हैं। दोनों का उद्देश्य नागरिकों के जीवन को बेहतर बनाना है, लेकिन उनकी प्रकृति और भूमिका अलग-अलग है।

मौलिक अधिकार और नीति-निर्देशक सिद्धांतों में अंतर

आधार मौलिक अधिकार राज्य के नीति-निर्देशक सिद्धांत
संवैधानिक भाग भाग III भाग IV
अनुच्छेद 12–35 36–51
मुख्य उद्देश्य व्यक्ति की स्वतंत्रता, समानता और गरिमा की रक्षा सामाजिक एवं आर्थिक कल्याण की व्यवस्था स्थापित करना
प्रकृति व्यक्तियों के अधिकारों की संवैधानिक सुरक्षा राज्य के लिए शासन संबंधी मार्गदर्शक सिद्धांत
न्यायिक प्रवर्तन न्यायालय द्वारा लागू कराए जा सकते हैं सामान्यतः न्यायालय द्वारा सीधे लागू नहीं कराए जा सकते
सरकार पर प्रभाव राज्य की शक्ति पर सीमाएँ लगाते हैं राज्य को नीतियाँ बनाने की दिशा देते हैं
मुख्य जोर राजनीतिक और नागरिक स्वतंत्रता सामाजिक और आर्थिक न्याय

दोनों के बीच संबंध

  • मौलिक अधिकार व्यक्ति की स्वतंत्रता और गरिमा की रक्षा करते हैं।
  • नीति-निर्देशक सिद्धांत ऐसी सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियाँ बनाने की दिशा देते हैं जिनमें अधिकारों का वास्तविक लाभ अधिक लोगों तक पहुँच सके।
  • मौलिक अधिकार लोकतंत्र की व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करते हैं।
  • नीति-निर्देशक सिद्धांत लोकतंत्र के सामाजिक और आर्थिक उद्देश्यों को आगे बढ़ाते हैं।
  • दोनों का व्यापक उद्देश्य न्याय, स्वतंत्रता, समानता और कल्याणकारी राज्य की स्थापना है।
परीक्षा में लिखने योग्य निष्कर्ष:
मौलिक अधिकार व्यक्ति की स्वतंत्रता और अधिकारों की रक्षा करते हैं, जबकि नीति-निर्देशक सिद्धांत राज्य को सामाजिक और आर्थिक न्याय स्थापित करने की दिशा में मार्गदर्शन देते हैं। इसलिए दोनों भारतीय संविधान के पूरक अंग हैं और मिलकर लोकतांत्रिक तथा कल्याणकारी राज्य की स्थापना में सहायता करते हैं।